तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता, मेरी तरह तेरा दिल, बेकरार है कि नहीं

‘गजल किंग’ कहे जाने वाले जगजीत सिंह के जन्मदिन 8 फरवरी पर उनके जीवन के रोचक पहलू…

भा रत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित दिवंगत जगजीत सिंह की मधुर आवाज आज भी हर गजल प्रेमी के कानों में गूंजती है। हारमोनियम पर उंगलियां थिरकाते हुए वे सुर संगीत की दुनिया में गहराई में कब लेकर चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता है। बहरहाल, जगजीत का बचपन का नाम जीत था। उनका जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। परिवार मूलतः पंजाब (भारत) के रोपड़ जिले के दल्ला गांव से ताल्लुक रखता था। उनके पिता चाहते थे कि वे इंजीनियर बने, लेकिन वे तो किसी और ही धूनी में मलंग थे। युवावस्था में जब चौबीस-पच्चीस साल की उम्र में जगजीत पंजाबी पगड़ी बांधे मुंबई आए तो एक दृढ़ निश्चय मन में था कि मुंबई में संगीत की दुनिया में एक नया मुकाम हासिल करूंगा। अपनी गजलों और नज्मों को उस शिखर तक पहुंचाऊंगा, जहां लोगों के सिर चढ़कर मेरा संगीत बोलेगा। जगजीत ने जैसा सोचा था किया भी बिल्कुल वैसा ही। हालांकि उन्हें मालूम था कि मुंबई जैसे अजनबी शहर में न तो उनके पास कोई आशियाना है और न ही पेट भरने की कोई मुकम्मल व्यवस्था बस यकीन था तो सिर्फ अपने हुनर पर।
कोई राह का रोड़ा टिकने न दिया…
कॅरिअर की शुरुआत एक एड जिंगल रिकॉर्डिंग से की। अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए जगजीत ने शादियों में गाना शुरू किया। कड़ी मेहनत के बाद उन्हें 1976 में अपना पहला एल्बम निकालकर कामयाबी मिली। उस एल्बम का नाम था ‘द अनफॉर्गेटेबल्स’। वाकई उस एल्बम ने जगजीत को नई बुलंदी पर पहुंचा दिया। एक नए लड़के को इतनी दिल छू लेने वाली गजलें सुनाता देख गजल के चाहने वालों ने उन्हें पलकों पर बैठा लिया। जगजीत के रास्ते भी बाधित करने के प्रयास किए गए, लेकिन उन्होंने किसी पत्थर को अपने आगे टिकने नहीं दिया। गजल सुनने वालों ने ये पहली बार जाना कि ‘आंख को जाम समझ बैठा था अंजाने में…’ और ‘मर के भी चैन ना पाया तो किधर जाएंगे…’ जैसी बेहतरीन शायरी भी इतने सहज तरीके से पेश की जा सकती है। जगजीत की सफलता के परचम लहराने लगे। उनकी सभी एल्बम लोगों की पसंदीदा बन गईं। इनमें ‘रेयर जेम्स’, ‘एक्स्टैसी’, ‘साउंड अफेयर’, ‘अ माइलस्टोन’ जैसी एल्बम शामिल है।
ऐसे जीवन संगिनी बनी चित्रा सिंह
जगजीत की जीवनसंगिनी चित्रा को शुरुआत में जगजीत और उनकी सिंगिंग दोनों ही पसंद नहीं थे। चित्रा सिंह की पहली शादी ब्रिटानिया बिस्किट कंपनी में काम करने वाले एक बड़े अधिकारी देबू प्रसाद दत्ता से हुई थी। चित्रा मुंबई में जहां रहती थीं, उनके सामने वाले घर में एक गुजराती परिवार रहता था। यहां जगजीत आते-जाते रहते थे। वे यहां गानों की रिकॉर्डिंग करते थे। एक दिन चित्रा को सामने वाले घर से गाने की आवाज सुनाई दी। जगजीत के वहां से जाने के बाद चित्रा ने पड़ोसी से पूछा क्या मामला है? पड़ोसी ने जगजीत की जमकर तारीफ की और उनकी रिकॉर्डिंग सुनाई। कुछ देर बाद चित्रा बोलीं…ये भी कोई सिंगर हैं। फिर साल 1967 में जब जगजीत और चित्रा एक ही स्टूडियो में रिकॉर्डिंग कर रहे थे, इस दौरान उनकी बात हुई। रिकॉर्डिंग के बाद चित्रा ने कहा कि, मेरा ड्राइवर आपको आपके घर तक छोड़ देगा। रास्तेे में चित्रा का घर आया तो उन्होंने जगजीत को चाय पर बुलाया। इसी दौरान जगजीत एक गजल गाते हैं और चित्रा किचन में सुन लेती हैं। चित्रा जगजीत से पूछती हैं ये गजल किसकी है, जगजीत कहते हैं ‘मेरी है’। बस फिर क्या था चित्रा जगजीत से इंप्रेस हो जाती हैं। इसके बाद दोनों अक्सर मिलने लगे और एक-दूसरे को पसंद करने लगे। फिर चित्रा और देबू का आपसी रजामंदी से तलाक हो गया और दोनों ने शादी कर ली।

जगजीत की एक खासियत थी कि वह वाद्यों के साथ कुछ न कुछ प्रयोग करते ही रहते थे। पहली बार उन्होंने ही गजल के लिए वायलिन, इलेक्ट्रिक गिटार, सेक्सोफोन और कांगो जैसे विदेशी वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया। फिल्मों से भी उनका नाता बहुत गहरा रहा। फिल्म ‘अर्थ’ में ऐसे कई गाने हैं जो जगजीत और उनकी पत्नी चित्रा ने गाए हैं। इन्हीं में से एक है-‘तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो…’। ऐसे ही 1982 में आई फिल्म ‘साथ-साथ’ में ‘तुम को देखा तो ये ख्याल आया’ ने खूब प्रसिद्धि हासिल की। कैफी आजमी का लिखा गीत…’झुकी-झुकी सी नजर बेकरार है कि नहीं, तू अपने दिल की जवां धड़कनों को गिन के बता, मेरी तरह तेरा दिल बेकरार है के नहीं’ भी जगजीत की आवाज में खूब चर्चित रहा। तो कुछ ऐसा था गजल के जादूगर जगजीत सिंह का सफरनामा।
वाद्य यंत्रों संग करते थे नए प्रयोग

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